Post by UPSC in Hindi
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Sankhya Philosophy in Hindi for UPSC भारतीय धार्मिक ग्रंथों में मुक्ति का महत्व सदा अनन्य रहा है. सभी धर्मों में मुक्ति को ही जीवन के अंतिम लक्ष्य के तौर पर प्रस्तुत किया गया है. इसी संबंध में प्राचीन भारत में मुक्ति की संविधाओं के तौर पर दर्शन के 6 मुख्य मार्ग विकसित हुए जिन्हें षड्दर्शन कहा जाता है. इन 6 दर्शनों के मूल एवं प्रयोजनों में थोड़ा अंतर अवश्य था किंतु सभी मुक्ति के ही साधन थे. इन 6 दर्शनों को 2-2 के तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, क्योंकि उन्हें एक दूसरे का संबंधी एवं अनुपूरक माना जाता है. ये हैं : सांख्य एवं योग, न्याय एवं वैशेषिक तथा मीमांसा एवं वेदांत दर्शन. एक अन्य दर्शन के तौर पर चर्वाक दर्शन भी महत्वपूर्ण है. Sankhya Darshan: सांख्य दर्शन जिसका शाब्दिक अर्थ संख्या अथवा “अंक” है, षड्दर्शन में सबसे प्राचीन है. इसका उल्लेख प्रत्यक्ष तौर पर भगवद्गीता में और अप्रत्यक्ष रूप में उपनिषदों में भी है. इसके प्रवर्तक कपिल मुनि थे. इसके अनुसार 25 मूल तत्त्व होते हैं जिनमें प्रकृति, बुद्धि महत,आत्म चेतना (अहंकार), आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, श्रुति, स्पर्श, दृष्टि, स्वाद, गन्ध, पाँच कर्मेन्द्रियां -वाक्, धारणा, गति, उत्सृजन एवं प्रजनन, मस्तिक, पुरुष इत्यादि हैं. मूल तत्वों में प्रकृति प्रथम है. इस दर्शन के अनुसार सृष्टि अथवा विकास किसी दैविक शक्ति की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि प्रकृति के अन्तर्वर्ती स्वभाव का परिणाम है. प्रकृति से बुद्धि महत का उदय होता है और परिणामतः आत्म चेतना की उत्पत्ति होती है. आत्म चेतना या अहंकार पाँच अन्य सूक्ष्म तत्त्वों को जन्म देता है जो हैं : आकाश, वायु, अग्नि , जल तथा पृथ्वी. इन 5 सूक्ष्म तत्त्वों से 5 भौतिक तत्त्वों अर्थात “पंच-महाभूतों” की उत्पत्ति होती है. पुनः इसके आधार पर 5 ज्ञानेन्द्रियों (श्रुति, स्पर्श, दृष्टि, स्वाद एवं गन्ध) तथा 5 कर्मेन्द्रियों (वाक्, धारणा, गति, उत्सृजन एवं प्रजनन) की उत्पति होती है. आत्म चेतना या अहंकार “मस्तिक” को जन्म देता है जो मूल तत्त्वों में 24वाँ है. यह समस्त इन्द्रियों तथा बाह्य संसार के बीच एक मध्यस्थ का कार्य करता है. शरीर और यहाँ तक कि सम्पूर्ण विश्व आत्म चेतना की ही उपज है. अंतिम या 25वाँ तत्त्व है पुरुष. सांख्य दर्शन का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त “त्रिगुण सिद्धान्त” है. इसमें मनुष्य के 3 गुणों का वर्णन है ,यथा, सतगुण (सदाचार,सत्य, विवेक, सौन्दर्य और सद्भावना आदि), रजो गुण (वासना,हिंसा, स्फूर्तिव, उग्रता, क्रियाशीलता इत्यादि ) तथा तमस गुण (मूर्खता , उदासी, अप्रसन्नता आदि). प्रकृति की अविकसित अवस्था में ये तीनों गुण सामान परिमाण में होते हैं; परन्तु जैसे-जैसे सृष्टि का विकास होता है,तीनों में से एक गुण अधिक प्रभावशाली हो जाता है और उनके अनुसार ही मनुष्य सृष्टि की व्याख्या करते हैं. इस त्रिगुणात्मक सिद्धांत ने भारतीय जीवनशैली एवं विचारधारा को अनेक रूपों में प्रभावित किया है. सांख्य दर्शन में 6 अध्याय और 451 सूत्र है. सांख्य दर्शन ने वैदिक के साथ-साथ गैर वैदिक आत्माओं में भी आत्मा के कई प्राचीन सिद्धांतों को प्रभावित किया है. सांख्य दर्शन के तहत विकसित विचारों का उल्लेख भगवद् गीता, उपनिषदों और वेदों जैसे प्रारंभिक हिंदू धर्मग्रंथों में पाया गया है और इसने बौद्ध व जैन अवधारणाओं को भी प्रभावित किया है. #UPSCinHindi #SamkhyaDarshan