Post by Shilpi Goyal
Author | #Reflectionsofawanderingheart
Presenting something I’ve written (on LinkedIn for the first time). पाँव सधे ज़मीन पर, ख्वाबों का आसमान ठहराव भी उतना ज़रूरी, जितनी ज़रूरी उड़ान — चल अचल स्थिर खड़े पेड़ों पर, उड़ते पंछियों का आशियाना। ठहरी हुई राहों पर, मुसाफ़िरों का आना जाना। आकाश के विस्तृत मौन में, बादलों की उड़ान। अचल पहाड़ों से गुज़रता नित्य नया तूफ़ान। समुद्र की लहरें इठलाती हैं, पर अडिग रहती चट्टान। निरंतर परिक्रमा धरा का गुण, सूरज सदा एक समान। हवाओं के रुख से बढ़ती घटती अग्नि की ज्वाला। ठहरे हुए दीपक से निखरे हर पल नवीन उजाला। गिरती बारिश की बूँदें, डोलती ऋतुओं का अनोखा रंग ढंग। अविचल धरती पर बिखरे, प्रकृति के सारे रंग। “चल”का सौंदर्य उसकी गति है, धैर्य है “अचल” की पहचान। जैसे चंचल मन बाँहें फैलाए, पर अडिग विश्वास आत्मा समान। चल और अचल के संगम में, जीवन पाता अपना स्वरूप। प्रेम ही देता हर अस्तित्व को, उसका सच्चा रूप।