Post by Sangayana Fernando

3rd year student at University of the Visual and Performing Arts

__राग जयजयवंती (Raga Jaijaivanti)__ 🟠 पूर्वांग प्रधान और विस्तार: यह एक पूर्वांग प्रधान राग है, जिसमें मंद्र सप्तक (Lower octave) पर अधिक ध्यान या बल दिया जाता है। इसके बावजूद, इस राग का विस्तार तीनों सप्तकों (मंद्र, मध्य, तार) में समान रूप से होता है। 🟠 गायन प्रधान राग: यह राग गाने में बेहद सुगम (मधुर) होने के साथ-साथ अत्यंत व्यापक है। इसलिए इसमें "ध्रुपद, धमार और ख्याल" जैसी गायन शैलियों को बहुत ही भावपूर्ण तरीके से गाया जा सकता है। यह मुख्य रूप से गायन प्रधान राग माना जाता है। 🟠 दो मुख्य राग-अंग: यह राग प्रमुख रूप से दो राग-अंगों के मिश्रण से बना है: ▪️देश अंग ▪️बागेश्री अंग 🟠 ध्रुपद और धमार गायक आमतौर पर "देश अंग" का उपयोग करते हुए अपनी प्रस्तुति देते हैं। 🟠 ख्याल गायक आमतौर पर "बागेश्री अंग" का आश्रय लेकर इस राग को गाते हैं। 🟠 विशेष स्वर संगति और रस: इस राग की विशेष स्वर संगतियां "रे ग म ग, रे ग॒ रे स, नि़ स ध़ नि़॒ रे" हैं। इस राग के गायन-वादन से "शृंगार रस, शांत रस" और साथ ही "गांभीर्य (वीर/गंभीर) रस" की अभिव्यक्ति होती है। 🟠 वक्र राग की प्रकृति: यह एक "वक्र राग" है, जिसका अर्थ है कि इसके स्वरों का चलन सीधा नहीं बल्कि टेढ़ा (जिग-जैग) होता है। इस राग में शुद्ध गांधार (ग) और शुद्ध निषाद (नि) के साथ-साथ कोमल गांधार (ग॒) और कोमल निषाद (नि॒) यानी दोनों प्रकार के 'ग' और 'नि' का प्रयोग होने के कारण इसकी प्रकृति वक्र हो जाती है। 🟠 थॉट (मेल) से संबंध: शुद्ध निषाद (नि) के प्रयोग के कारण यह "खमाज थाट" से और कोमल गांधार (ग॒) व कोमल निषाद (नि॒) के प्रयोग के कारण यह "काफी थाट" से भी समानता दर्शाता है। (समीक्षकों द्वारा इसे प्रायः खमाज थाट के अंतर्गत माना जाता है)। 🟠 परमेल प्रवेशक और मिश्र राग: यह एक "परमेल प्रवेशक" और मिश्र राग है। इसी वजह से इस राग के भीतर देश, बागेश्री, सोरठ और काफी जैसे रागों के अंग समाहित हैं। 🟠 उपर्युक्त अंगों के अलावा, इसमें कहीं-कहीं "गौड़ अंग" और "बिलावल अंग" की झलक भी दिखाई देती है। 🟠 फिर भी, मुख्य रूप से इसे "देश अंग" और "बागेश्री अंग" प्रधान राग ही माना जाता है। 🟠 राग में शामिल विभिन्न अंग (Swar Patterns of Different Angas): 🔅 देश अंग: ▪️रे म प नि ▪️म प नि सं ▪️नि॒ ध प 🔅 बागेश्री अंग: ▪️ध नि॒ ध म ▪️म प ध ग॒ , रे स ▪️सोरठ अंग: ▪️नि़ स म रे, नि़ स 🔅 काफी अंग: अवरोह में जब कोमल गांधार (ग॒) और कोमल निषाद (नि॒) का प्रयोग होता है, तब कुछ समय के लिए 'काफी राग' का स्वरूप उभर कर आता है। 🔅राग की पहचान (Special Feature): 🟠 ऋषभ (रे) का महत्व: ऋषभ (रे) स्वर पर न्यास करने (ठहरने) से इस राग को अन्य समप्रकृति रागों से आसानी से अलग पहचान लिया जाता है। इसके अलावा, ऋषभ (रे) स्वर को 'आंदोलित' (Andolit - गूंज के साथ हिलाना) करके गाना या बजाना इस राग की एक अनूठी विशेषता है। - संगायाना प्रनान्दू- #RaagJaijayawanthi #Summery #NorthIndianMusic #ClassicalMusic

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