Post by Sakshi Mehta
हिंदी साहित्य शोधार्थी | एम.ए. हिंदी | लेखिका | रचनात्मक लेखन और शैक्षणिक अनुसंधान
मैंने देखा है उसे मुस्कुराते हुए, खिलखिलाते हुए और जार-जार रोते हुए भी। कभी वह टूट जाता है एक मिट्टी के खिलौने की तरह, कभी अडिग पहाड़ सा हर मुसीबत को हँस कर टाल जाता है। हर दिन मैं उसे देखती हूं पास से, कितना पास से? अब कोई ये न पूछना। इतना, जितना मैं झांकती हूं अपने भीतर, और हर बार आश्चर्य से भर उठती हूं खुद को देखकर। बस उतना ही मैं उसे देखती हूं, और बस देखती ही रहती हूं... एकटक घूरते हुए। (साक्षी) क्या आपने भी कभी खुद को इतनी गहराई से महसूस किया है कि आप खुद को एक अजनबी की तरह देख सकें? अपने विचार साझा करें। #HindiLiterature #SelfReflection #Poetry #CreativeWriting #Mindfulness #HindiSahitya #PersonalGrowth