Post by Praveen Singh
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"कुछ ठान कर"... कुछ ठान कर,निज धार धर ना बैठे यूँ बेकार कर कुछ गरल कर,कुछ सरल कर टूटे ही सही पर ख्वाब धर... बिखरे हुए नन्हें कोशिशों में खुद का ना परिहास कर बंधन को तू आजाद कर थके कदमों में हुंकार भर.... हठ करना है,जी भरकर कर काँटों की तू फिक्र ना कर मंजिल मिल जाएगी इकदिन बस रास्ते चुन ले जीभरकर.... दुनियाँ ने कहाँ परोसा है जो बनेगा अपना भरोसा है सिमटी सी आकांक्षा में आकाश सा विस्तार तो धर.... ब्रह्मांड सा आदि रूप है तेरा अपनी उल्काएं खुद बरसा औने-पौने रिवाजों में सने सरपरस्तों को आईना तो दिखा.... ©प्रवीण #हिन्दीकविता #हिन्दीकाव्य #हिन्दी #hindipoetry #poetry