Post by Mukul Srivastava
Sr. Professor & Chairperson University Data Resource Centre , & Director IPPR University of Lucknow.Certified Fact Check Trainer @ Google News Initiative India Training Network
नब्बे के दशक तक, गर्मियों की दोपहर में किराये की दुकान से दो रुपये में 'राज कॉमिक्स', 'डायमंड कॉमिक्स' या 'चाचा चौधरी' लाकर छुपकर पढ़ना हर बच्चे का सबसे बड़ा शौक हुआ करता था । उन पन्नों की महक और तस्वीरों की रंगीन दुनिया हमें कल्पनाओं के असीमित ब्रह्मांड में ले जाती थी। सोचता हूँ, अगर हमारे ज़माने में सोशल मीडिया या इंटरनेट होता, तो क्या हम इन शौकों को इतनी शिद्दत से जी पाते? शायद नहीं। हमारे समय के शौक हमें 'सब्र', 'तटस्थता' और 'एकाग्रता' सिखाते थे। अलमारी में बंद वह पुरानी स्टैम्प बुक और धूल खाती डायरियाँ आज केवल कागज़ के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि इंटरनेट के मायाजाल में फँसने से पहले के उस बेहद खूबसूरत, धीमे और ठहर कर जीने वाले दौर का जीवंत दस्तावेज़ हैं ।पढ़ें आज के प्रभात खबर में प्रकाशित लेख इसे मेरे http:// mukulmedia.blogspot.com ब्लॉग पर भी पढ़ा जा सकता है |