Post by Gautam sah

News Reporter at Batangarh | ex Amar Ujala | University of Allahabad

इंटरनेट बनाम वास्तविकता : समय रैना का 'पुनर्जन्म' __________ इंटरनेट वास्तविकता को निगल रहा है। सोशल मीडिया के सामग्री प्रदाता (Content Creators) एक ऐसे 'यूटोपिया' (छद्म-स्वर्ग) में जी रहे हैं जहाँ धरातल की सच्चाई ओझल है। हाल ही में मशहूर स्टैंडअप कॉमेडियन समय रैना ने एक वीडियो अपलोड किया—"Samay Raina Still Alive"। यह शीर्षक उन आलोचकों के मुँह पर एक करारा तमाचा है, जिनका एकमात्र उद्देश्य समय के करियर को निगल जाना था। समय वह व्यक्ति हैं जिन्होंने गालियों को हास्य के एक माध्यम के रूप में पेश किया और लोगों को हंसाया। उनकी गाली भले ही 'अभिधा' (शाब्दिक अर्थ) में होती है, लेकिन उसका प्रभाव 'व्यंजना' (भावार्थ) में छिपा होता है। वे जब खुद को या अपने किसी साथी को गाली देते हैं, तो वहाँ गाली का अर्थ 'अपमान' नहीं होता, बल्कि वह 'दोस्ती की घनिष्ठता' या 'अति-ईमानदारी' का प्रतीक होती है। वे कला की दृष्टि से गाली को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं। उनकी गालियाँ किसी को 'नीच' दिखाने के बजाय एक 'मस्ती भरे माहौल' या मन के 'फ्रस्ट्रेशन' को व्यक्त करने की व्यंजना पैदा करती हैं। वैसे, हिंदी साहित्य का गलियारा भी गालियों से अछूता नहीं है। विद्रोही और यथार्थवादी कथाकार जगदम्बा प्रसाद दीक्षित ने एक भरी साहित्यिक गोष्ठी में आलोचना के शिखर पुरुष नामवर सिंह को सरेआम "भड़वा" और "साहित्यिक दलाल" कहकर पुकारा था; उनका लहजा इतना हिंसक था कि पूरी सभा में सन्नाटा छा गया। इसी कड़ी में पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' ने उन आलोचकों को, जो उनके साहित्य को अश्लील कहते थे, "साहित्यिक हिजड़ा" और "नपुंसक" तक कह दिया था। सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने बनारसीदास चतुर्वेदी के लिए "साला", "पाजी" और "घुटनों में अक्ल रखने वाला गधा" जैसे शब्दों का प्रयोग अपने निजी पत्रों में किया। मलयज ने अपनी डायरी में समकालीन लेखकों के प्रति अपनी नफरत जाहिर करते हुए उन्हें "बौद्धिक वेश्या", "कमीना", "सुअर" और "मक्खीचूस" जैसे विशेषणों से नवाजा। यहाँ तक कि कृष्ण बलदेव वैद ने नामवर सिंह के विरुद्ध अपनी भड़ास निकालते हुए उन्हें "आलोचना का जोकर" और "बौद्धिक ठग" तक कह डाला। इन सब की आलोचना हुई और होनी भी चाहिए, लेकिन समय रैना की गालियाँ इन सबसे इतर (अलग) हैं। समय अपनी अमेरिका यात्रा को याद करते हुए वीडियो का श्रीगणेश करते हैं। जब वे उस विवादास्पद वीडियो को सार्वजनिक करने की प्रक्रिया की व्याख्या कर रहे थे, तो ऐसा लग रहा था मानो वे इस धरा की तमाम गलतियाँ गिनवा रहे हों। फिर भी, नियति को कौन टाल सकता है? जो नहीं होना चाहिए था, वही हुआ। बहुत ही संभल कर चलने वाला वह व्यक्ति मट्ठा से जल गया, जो दूध भी फूँक-फूँक कर पीता था। इंटरनेट एक ऐसा मुखौटा है जिसे पहन कर हम जैसा चाहें वैसा दिख सकते हैं। इसमें बुरे व्यक्ति की 'अच्छाई' तो स्वीकार कर ली जाती है, पर एक अच्छे व्यक्ति की छोटी सी 'बुराई' भी तनिक बर्दाश्त नहीं की जाती। समय ने इस वीडियो में अपनी पीड़ा जाहिर करने की पूरी कोशिश की, लेकिन शायद वे पूरी तरह सफल नहीं हो पाए। एक तरफ मीडिया ट्रोलिंग, नफ़रती संदेश, नींद की गोलियाँ, शरीर की झनझनाहट और माँ-बाप की चिंता थी, तो दूसरी तरफ हज़ारों लोगों के सामने खड़े होकर अपने शब्दों का अभिनय करना। ये एक ही सिक्के के दो ऐसे पहलू हैं जिनका एक साथ होना असंभव ज्ञात होता है, लेकिन समय ने इसे संभव कर दिखाया। वह अपने जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई लड़े। सबसे दुखद बात यह है कि मिलियंस में फॉलोअर्स रखने वाला वह लड़का अपने सबसे... ---- पूरा लेख फेसबुक पर है।

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