Post by Dr. Prakash Sharma

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SANATAN LABS - गब्बुआ के 'मुफ्त वाली रेवड़ी' अउर आत्मा के कंगाली—एक माइक्रो-बायोलॉजी चीर-फाड़ (PASSIONIT PRUTL KALKI AIDHARMA framework) Krisna: ए गब्बुआ! ई जे तू 'मुफ्त' के रेवड़ी खा-खा के गाल फुलावत हव न, ई कौनों प्रगति ना ह—ई त तोहरे भीतर के 'प्योरिटी एनर्जी' के दीमक ह। तू सोचत हव कि सरकार या समाज तोहे मुफ्त में माल दे के तोहार भला करत बा? ना रे पगला! ई त तोहरे कोशिका (cells) में 'भ्रष्टाचार के वायरस' घुसावल जा रहल बा। सुन गब्बुआ, जब तू कौनों चीज बिना मेहनत के पावे के आदत डाल लेब, त तोहार दिमाग 'ड्रेन्ड ब्रेन' बन जाई। तोहरे भीतर जे 'स्व-धर्म' के आग बा, उ बुझ जाई। ई रेवड़ी कौनों विटामिन ना ह, ई त 'बायोलॉजिकल करप्शन' ह जे तोहरे आत्म-सम्मान के माइटोकॉन्ड्रिया के फूूँक देत बा। जब कोशिका ही आलसी हो जाई, त पूरा शरीर और समाज बीमार पड़ जाई। हे गब्बुआ, जैसे एक परजीवी अपने मेजबान को धीरे-धीरे अंदर से खोखला कर देता है, वैसे ही यह 'रेवड़ी संस्कृति' मनुष्य की कार्यक्षमता को समाप्त कर देती है। जब अयोग्य व्यक्ति को मुफ्त के लाभ दिए जाते हैं, तो समाज के कर्मठ अंगों में आक्रोश पैदा होता है, जिससे व्यवस्था का 'इम्यून सिस्टम' यानी प्रशासन ही अपने लोगों पर हमला करने लगता है—इसे विज्ञान की भाषा में 'साइटोकाइन स्टॉर्म' कहते हैं। जैसे शरीर को ऊर्जा के लिए ATP चाहिए, वैसे ही उद्यमिता के लिए 'जुनून' चाहिए। रेवड़ी मिलते ही मस्तिष्क का वह हिस्सा सो जाता है जो नवाचार (Innovation) करता है। रिसर्च भी यही कहती है कि जब मुफ्त की चीजें अर्थव्यवस्था में घुसती हैं, तो सारा ढांचा ही चरमरा जाता है। गब्बुआ, याद रख! जिस दिन ई 'करेंसी' के रंग उड़ी और डिजिटल नंबर गायब होइहें, उस दिन तोहार 'रेवड़ी' तोहार पेट ना भरी। उस दिन काम आई तोहार 'टैंजिबिलिटी'—यानी तू का बनावे जानत हव? तोहार हुनर का बा? जे 'मुफ्त' के लाइन में खड़ा बा, उ 'कालकि एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर' कबहूँ ना बन पाई। अधिकारी उ बनी जे 'रीसाइकलर' होई, जे कूड़ा से कंचन बनावे जानत होई। रेवड़ी छोड़, 'प्योरिटी एनर्जी' पकड़, तबहिए ई 'गिल्डेड केज' यानी सुनहरा पिंजरा से बाहर निकल पइब। रेवड़ी से पेट त भर जाई, बाकिर आत्मा मर जाई। उठ, मेहनत कर, अउर ई 'माइक्रो-बायोलॉजी ऑफ करप्शन' के वैक्सीन खुद के मेहनत से तैयार कर!

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